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दुर्गा पूजा

दुर्गा पूजा 2017 और 2018

दुर्गा पूजा एक बंगाली हिन्दू त्योहार है जो भारत के बंगाल राज्य में साथ ही इसके अन्य हिस्सों में मनाया जाता है जहाँ अब पारंपरिक बंगाली निवास करते हैं।

सालतारीखदिनछुट्टियांराज्य / केन्द्र शासित प्रदेश
201727 सितंबरबुधवारमहा सप्तमीAS BR OR WB
28 सितंबरगुरूवारमहा अष्टमी AP AS BR JH OR RJ
TG WB
29 सितंबरशुक्रवारमहा नवमी AS BR JH JK KA KL
OR PY TN TR UP WB
30 सितंबरशनिवारदुर्गा पूजा / दशहरा
विजयादशमी
सभी राज्य
(सिवाय AN AR DD DN
LD ML MN MZ NL PB
SK)
201816 अक्टूबरमंगलवारमहा सप्तमीAS BR OR WB
17 अक्टूबरबुधवारमहा अष्टमी AP AS BR JH OR RJ
TG WB
18 अक्टूबरगुरूवारमहा नवमी AS BR JH JK KA KL
OR PY TN TR UP WB
19 अक्टूबरशुक्रवारदुर्गा पूजा / दशहरा
विजयादशमी
सभी राज्य
(सिवाय AN AR DD DN
LD ML MN MZ NL PB
SK)

दुर्गा पूजा का उत्सव हिन्दू देवी माता दुर्गा की पूजा पर आधारित होता है जिन्हें उनके चार बच्चों के साथ 10 भुजाओं वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है। दुर्गा पूजा परिजनों से मिलने का और बंगाली लोगों की सांस्कृतिक विरासत को सराहने का भी समय होता है।

दुर्गा पूजा का उत्सव अश्विन मास में मनाया जाता है और ग्रेगोरियन पंचांग के अनुसार यह सितंबर या अक्टूबर महीने में पड़ता है। दुर्गा पूजा के लिए चुनी गयी तिथियां उस समय पर आधारित होती हैं जब रामजी ने माता दुर्गा का आह्वान किया था, और इसके बाद युद्ध में रावण और उसके दुष्ट राक्षसों का अंत किया था।

इतिहास में पहली बार दुर्गा पूजा का विवरण लगभग 16वीं ईसवी के दौरान बंगाल में मिलता है। इसके बाद यह वार्षिक उत्सव जारी रहा और 1911 में जब दिल्ली को ब्रिटिश भारत की नयी राजधानी बनाया गया तब कई बंगाली काम करने के लिए वहां चले गए और इस प्रकार यह उत्सव दिल्ली में मनाया जाने लगा। इसी प्रकार, यह उत्सव मुम्बई और अन्य शहरों में भी संचारित हुआ जहाँ बंगालियों ने प्रस्थान किया। अंत में, अन्य देशों में रहने वाले बंगालियों ने भी इस उत्सव को मनाना शुरू कर दिया। हालाँकि, आज भी सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल में कलकत्ता की नगरपालिका में आयोजित की जाती है।

दुर्गा पूजा के उत्सव में 10 दिनों का उपवास, दावत और माता दुर्गा की पूजा शामिल होती है। हालाँकि उत्सव के अंतिम पांच दिन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं। जिन्हें निम्नलिखित रूप में मनाया जाता है:

  • षष्ठीके दिन, माना जाता है कि माता दुर्गा अपने चार बच्चों के साथ धरती पर आती हैं। यह केवल तभी होता है जब उनके आगमन को पुजारियों के द्वारा जाग्रत किया जाता है। आज के दिन ही माता की प्रतिमाओं में आँख बनाई जाती है या स्थापित की जाती है।
  • सप्तमी के दिन, माना जाता है कि जटिल अनुष्ठानों के साथ माता को आमंत्रित करने पर माता प्रतिमाओं में प्रवेश करती हैं।
  • अष्टमी के दिन, माना जाता है माता दुर्गा ने महिषासुर के दो राक्षसों (चंड और मुंड) का वध किया था।
  • नवमीके दिन महा आरती का आयोजन किया जाता है। माना जाता है कि इस दिन माता दुर्गा ने युद्ध में महिषासुर का वध किया था। लोग अपने सर्वश्रेष्ठ वस्त्र धारण करके विशेष प्रसाद ग्रहण करते हैं जिसे पहले दुर्गा माँ को चढ़ाया जाता है।
  • इस उत्सव के अंतिम दिन दशमीको दुर्गा माता की प्रतिमाओं की शोभायात्रा निकाली जाती है। चारों तरफ नाच-गाना होता है। प्रतिमाओं को विसर्जित करने के लिए नदियों या अन्य जलीय स्थानों पर ले जाया जाता है। इसके बाद भक्तगण दोस्तों और परिजनों से मिलने जाते हैं, बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं, मिठाइयों और स्वादिष्ट पकवानों का आनंद उठाते हैं, और पारंपरिक परिधान धारण करते हैं।

भारत के कई हिस्सों में दुर्गा पूजा से जुड़े समारोहों और गतिविधियों का आयोजन किया जाता है जिसमें अक्सर पर्यटक हिस्सा लेते हैं, उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:

  • कोलकाता, पश्चिम बंगाल का मुख्य उत्सव। यहाँ आपको नृत्य, नाटक आदि का प्रदर्शन देखने के लिए मिलेगा, बंगाली व्यंजन और सड़कों पर कई स्टॉल मिलेंगे जहाँ आप सांस्कृतिक चीजें खरीद सकते हैं। यहाँ माता दुर्गा के कई ‘पंडाल’ देखने को मिलते हैं।
  • निकट स्थित उत्तरी कोलकाता के कुमारटुली में, जहाँ दुर्गा माँ की ज्यादातर प्रतिमाएं निर्मित की जाती हैं। उनमें से कई का निर्माण मिट्टी से किया जाता है, और दुर्गा पूजा के दौरान यहीं पर माता दुर्गा की प्रतिमाओं पर आँखों को पेंट किया जाता है।
  • दिल्ली के चित्तरंजन पार्क में शहर का सबसे पुराना दुर्गा पूजा उत्सव आयोजित किया जाता है, जिसे अक्सर “छोटे कोलकाता” के रूप में जाना जाता है।
  • मुम्बई में, सन् 1950 से बंगाल क्लब शिवाजी पार्क में दुर्गा पूजा आयोजित कर रहा है। इसके अलावा, लोखंडवाला गार्डन में एक अन्य दुर्गा पूजा आयोजित की जाती है जिसमें आमतौर पर बड़ी हस्तियां शामिल होती हैं।

दुर्गा पूजा के त्योहार के दौरान बंगाली सभ्यता और संस्कृति के बारे में काफी कुछ सीखा जा सकता है। यह उत्सव रंगारंग और लोगों से भरा होता है।